अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द

सामान्य

अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

nakabiliyato ke babjood

जो अपना ज़मीर नहीं मार सकते
वे इस मौजूदा दौर में
ज़िन्दा रहने के काबिल नहीं
मैं उन्हीं में से एक हूं

मेरा वज़ूद मुझसे ख़फ़ा है
क्योंकि मैंने रूह से वफ़ा करनी चाही
और अपना ज़मीर नहीं मार पाया

इतनी अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द
मैं ज़िन्दा हूं
यह एक खोजबीन का मसअला है
उन तमाम खु़दावंद माहिरीन के लिए
जिन्होंने इस्पात के ऐसे मुजस्समें ईज़ाद किए
जिनके कि सीने में धड़कन नहीं होती
और जिनकी दिमाग़ जैसी चीज़
उनकी उंगलियों की हरकतों की मोहताज़ है

मैं यह राज़
लोगों में फुसफुसाता हूं
वे चौंक उठते हैं सहसा
फिर मुस्कुरा देते हैं
एक हसीन मज़ाक समझकर

मैं चौराहों पर चीख़ चीख़ कर
लोगों की तरफ़
उछालता रहता हूं यह राज़
अजीब नज़रों से बेधा जाता है मुझे

बेखौ़फ़ हैं सभी खुदावंद माहिरीन
क्योंकि अभी यह क़यामतख़ेज राज़
लोगों के गले नहीं उतर रहा
और मेरे सरफिरा होने की
अफ़वाहें जोरों पर हैं

चाहे वे मेरी तरफ़ से
अपने आपको कितना भी बेपरवाह दिखाएं
पर एक-एक हरकत मेरी
पूरी शिद्दत से परखी जा रही है

जिस दिन भी मैं
इतनी अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द
अपना ज़िन्दा होना
साबित कर सकने की क़ूवत पा लूंगा

मुझे मुर्दा करार दे दिया जाएगा
०००००
रवि कुमार

21 responses »

  1. मेरा वज़ूद मुझसे ख़फ़ा है
    क्योंकि मैंने रूह से वफ़ा करनी चाही
    और अपना ज़मीर नहीं मार पाया
    ++
    मुझे मुर्दा करार दे दिया जाएगा
    तल्ख हकीकत बयान कर दिया आपने तो.

    • सहजता या सरलता सिर्फ़ एक सतही भाव पैदा करके निकल जाती है…
      बिना किसी गहरी जुंबिश के…
      सिर्फ़ हमारे पास पहले से समेकित विचारों, संदर्भों की ओर इंगित करके…
      दिमाग़ में कोई माथापच्ची पैदा नहीं होती…
      पारंपरिक सोच और विचारों में कोई ख़ास हलचल नहीं हो पाती…
      कुछ नया नहीं जुड़ पाता…
      ऐसा मुझे खु़द के अनुभवों से लगता रहा है…

      दूसरी ओर यह भी लगता है..
      कि इस सबको बचाते हुए…
      भाषा की सरलता और सहजता…प्रतीकों की आम बोधगम्यता…
      बेहद जरूरी है, यदि आपको अपनी कविता के जरिए…
      आम जन से संवाद स्थापित करना है तो…

      इस तरह कविता का यह अंतर्विरोध सामने आता है…

      जाहिर है, आपका यह चेताना बिल्कुल प्रासंगिक है…..

  2. वे मुर्दा घोषित करने की फिराक में रहें, वे शरीरों को मार सकते हैं। मुर्दा रजिस्टर मे उन के नाम भी दर्ज कर सकते हैं।
    रूहों को मारना किस के बस में है? वे जिन्दा रहती हैं और नए शरीर तलाश लेती हैं।

  3. आप इतनी गहरी सोच को उकेर देते हैं…जो की सामजिक सच्चाई भी बयाँ करती है ….आपका लिखा हमेशा दिल में अजीब उमंग पैदा करता है

  4. ये आपका कॉपीराइट है… इसको पेटेंट करवा लीजिये… ऐसे किरदार उदासी भरी आर्टिस्ट ही जीते है… जो कभी किसी सूने और उदास शाम को कन्धा देने का काम करते है… मैं भी लौटता हूँ महीने में एक-आध बार इसी ख्याल पर…

  5. Ravi Bhaiyya,
    Ruko ek minute, dobara padhna chahti hoon… haan… kaafi gahrayi hai, main doob kar ubhar nahin paa rahi hoon… Main aur doob jati, pahli hi baar mein, agar aap, Maahireen, Khudavand, Mujassame… jaise alfaazon ka matlab bhi likhte… aapki tarah intelligent hone mein abhi waqt hai na bhaiyya… But after all It’s again a brilliant gem of your collection… Congrats!!!

    • प्रज्ञा दीदी,
      सही कहा तुमने…

      अक्सर मैं ऐसे शब्दों के अर्थ दे दिया करता था…
      इस बार रह गये…

      हालांकि अब मैं लगभग पीछा छुडा चुका हूं ऐसे प्रयोगों से…
      ये पुरानी कविताएं हैं…
      खैर…

      वैसे एकाध को छोडकर अगर माथापच्ची करती तो अर्थ मिल जाते..अपने आप..

      जैसे..
      माहिरीन: जो माहिर हो, माहिर शब्द तो सुना हुआ ही है…यानि कि विशेषज्ञ…
      खुदावंद: खुदा की वंदगी करने वाले..बस इन दो शब्दों को मिलाकर देखना था…इनको भी पहले से ही हम जानते हैं…यानि पूजा-पाठ करने वाले…धार्मिक आदमी…
      मुजस्समें: यह जरूर नया शब्द है..इसका मतलब होता है…पुतले…इस्पाती मुजस्समें..यानि की इस्पात/लोहे के पुतले…यहां मेरा आशय रोबोटों से था….

      वाकई…मुझसे जल्दबाज़ी हुई…

  6. मैं यह राज़
    लोगों में फुसफुसाता हूं
    वे चौंक उठते हैं सहसा
    फिर मुस्कुरा देते हैं
    एक हसीन मज़ाक समझकर

    मैं चौराहों पर चीख़ चीख़ कर
    लोगों की तरफ़
    उछालता रहता हूं यह राज़
    अजीब नज़रों से बेधा जाता है मुझे
    बहुत उम्दा क्रिती
    मैं मुर्दों के बीच खडा आज़ादी की मशाल लिये,!
    लोग आये तलवारें लेकर मैं खडा बस ढाल लिये !!
    -धर्मेन्द्र कुमार रविकुल

    “बहुत मुश्किल है कहना दिल कि बातों को मगर कहना भी जरूरी है !
    ज़ज़्बातों को ज़ुबां नहीं मिलती कम्बख्त हालात कि ये मज़बूरी है !!”
    -धर्मेन्द्र कुमार रविकुल

  7. बेखौ़फ़ हैं सभी खुदावंद माहिरीन
    क्योंकि अभी यह क़यामतख़ेज राज़
    लोगों के गले नहीं उतर रहा
    और मेरे सरफिरा होने की
    अफ़वाहें जोरों पर हैं

    चाहे वे मेरी तरफ़ से
    अपने आपको कितना भी बेपरवाह दिखाएं
    पर एक-एक हरकत मेरी
    पूरी शिद्दत से परखी जा रही है

    जिस दिन भी मैं
    इतनी अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द
    अपना ज़िन्दा होना
    साबित कर सकने की क़ूवत पा लूंगा

    भाई रवि जी
    बहुत ही बेहतरीन कविता

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