किधर गये वो वायदे? सुखों के ख़्वाब क्या हुए? – शलभ श्रीराम सिंह

सामान्य

किधर गये वो वायदे? सुखों के ख़्वाब क्या हुए? – शलभ श्रीराम सिंह
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, शलभ श्रीराम सिंह की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

बडे़ आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें……

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०००००००

रवि कुमार

20 responses »

  1. एक जोरदार शब्दों से उठाई गई आवाज दिल तक गई। बहुत सुन्दर रचना। आपकी पोस्टर शैली हमें अच्छी लगती है। हमें भी सिखा दीजिए।

  2. सुंदर ..!
    कोई ख़्वाब दिखाए , तू भरोसा ना करना ..!
    जो सजाने हैं , अपनी आँखों में सजा ,
    किसी औरके ख़्वाबों की ताबीर बन जा,
    उनके ख़्वाब अपनी आँखों में सजा…

  3. पोस्टर कविता – बढ़िया आत्ममन्थन का तरीका।
    वैसे कुल मिला कर भारत के ये साल बरबाद नहीं लगते। और सतत परिवर्तन बनाम इंकलाब में सतत परिवर्तन बेहतर!

  4. sriman ji,
    Aap k poster ko hamne aap ki anumati se loksangharsh Patrika k june ank mein aap ka jikr karte hue prakashit kiya tha meri galti yah hai ki main aap ko bhej nahi paya kripya aap apna postal address bhejne ka kast karein .aap ka blog jab main dekhta hoon mujhe nishchit roop se hardik prasannta hoti hai. aap nishchit roop se ati sarahaniy kary kar rahe hai , aur bhavishy mein ham pathko ki bhavnao ko aur udhvelit karne k liye aap apna kary jaari rakhenge. chama k icchuk
    aap ka

    suman
    loksangharsha.blogspot.com
    loksangharsha@gmail.com
    loksangharsha.page.tl
    loksangharsha.wetpaint.com

  5. bhai ravi ji maza aa gaya

    नफस नफस कदम कदम बस एक फिक्र दम-बदम
    घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए ,
    ज़बाब दर सवाल है कि इन्कलाब चाहिए |
    इन्कलाब .. जिंदाबाद , जिंदाबाद… इन्कलाब
    जहां आवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से ,
    जहाँ पे लफ्ज-ए-अमन एक खोफनाक राज हो
    जहाँ कबूतरों का सर परस्त एक बाज़ हो
    वहां ना चुप रहेंगे हम कहेंगे हाँ कहेंगे हम
    हमारा हक हमारा हक हमें जनाब चाहियें |
    घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए
    ज़बाब दर सवाल है कि इन्कलाब चाहिए |

    ये गीत मुझे बहुत ही पसंद है
    आज आपने कई वेर्शो के बाद यादें ताज़ा कर दी |
    मेरी bitiya इसे बहुत गुनगुनाती हें

  6. भाई रवि जी मज़ा आ गया

    नफस नफस कदम कदम बस एक फिक्र दम-बदम
    घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए ,
    ज़बाब दर सवाल है कि इन्कलाब चाहिए |
    इन्कलाब .. जिंदाबाद , जिंदाबाद… इन्कलाब
    जहां आवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से ,
    जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हो जान से
    जहाँ पे लफ्ज-ए-अमन एक खोफनाक राज हो
    जहाँ कबूतरों का सर परस्त एक बाज़ हो|
    वहां ना चुप रहेंगे हम कहेंगे हाँ कहेंगे हम
    हमारा हक हमारा हक हमें जनाब चाहियें |
    घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए
    ज़बाब दर सवाल है कि इन्कलाब चाहिए |

    ये गीत मुझे बहुत ही पसंद है
    आज आपने कई वेर्शो के बाद यादें ताज़ा कर दी |
    मेरी bitiya इसे बहुत गुनगुनाती हें

  7. शीन काफ निजाम की एक लाइन याद आती है ऐसे हालत में

    वे कुछ नहीं करेंगे,
    उन्हें कुछ करना ही कब था.



    ,…

    मजीद भरोसा मत करो
    जो करना है खुद करो

    यही असल-ए- ग़ज़ल है…

  8. कविता पोस्टर !!! जी बहुत अच्छे, अभिव्यक्ति का क्या साधन ढूंढ लाए हैं आप ! आप बधाई के पात्र हैं क्योंकि आपके पास अभिव्यक्ति का यह साधन जो है !
    आपका ट्विटर पृष्ठ नहीं खुल रहा मैं फ़ौलो करना चाह रहा था !

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