चाहे मुझे पागल करार दिया जाए

सामान्य

चाहे मुझे पागल करार दिया जाए
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

pagal

कोई यदि पूछेगा
सबसे बेहतर रंग कौनसा है
मैं कहूंगा मिट्टी का

यदि कोई पूछेगा
सबसे दिलकश गंध किसकी है
मैं कहूंगा पसीने की

कोई यदि पूछेगा
स्वाद किसका सबसे लज्जत है
मैं कहूंगा रोटी का

यदि कोई पूछेगा
स्पर्श किसका सबसे उत्तेजक है
मैं कहूंगा आग का

कोई यदि पूछेगा
किसकी आवाज़ में सबसे ज़्यादा खनक है
मैं कह उठूंगा मेरी ! तुम्हारी !

चाहे मुझे पागल करार दिया जाए

०००००

रवि कुमार

28 responses »

  1. कोई यदि पूछेगा
    सबसे बेहतर रंग कौनसा है
    मैं कहूंगा मिट्टी का
    ====
    कोई यदि पूछेगा
    सबसे बेहतर कविता कौन सी
    मै कहूँगा “चाहे मुझे पागल करार दिया जाए”

  2. मुझे आपका ब्लॉग बहुत पसंद है। चोरी छुपे खुलेआम आते रहता हूं। पाश को जब पहली बार पढ़ा तो कई रातों की नींद चली गई। लगा कि दुनिया सिर्फ इसी कवि को क्यों नहीं पढती। आप अच्छा कर रहे हैं। पाश को नेत्रजाल पर लाकर।

  3. क्या कहूँ ..कुछ शब्दों को पढने के बाद सिर्फ दोबारा पढने को जी चाहता है …बार बार पढ़ते रहने को जी चाहता है..मेरा भी जी यही जी चाह रहा है….इसलिए इससे ज्यादा नहीं लिखूंगा

  4. उस वक्त में पसीने की गंध को अच्छा बता रहे हैं, जब डिऑड्रेंट बनाने वाली कंपनियां एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं यह साबित करने के लिए कि वे लोग कितने बुरे, कितने गंदे होते हैं, जिन्हें पसीना आता है…आप वाकई पागल करार दिए जाएंगे…दुनिया बदलने की चाह रखने वाले पागल…बेहतरीन कविता रवि जी…पाश सी आग है…

  5. मेरे एक मित्र हैं देवेंद्र कुमार देवेश, साहित्य अकादमी में है, हिंदी में उसका अपना और अनुवाद के जरिए, दूसरी भाषाओं का जो छपता है, उससे वे मुझे परिचित कराते रहते हैं. कुछ महीने पहले तक मै उनसे अकसर हिंदी-कविता जगत में आए ठहराव पर चर्चा करता रहता था. अब नहीं करता, मेरी कविताओं की भूख शांत हो जाती है, जिसमें आपका बहुत बड़ा योगदान है. आपकी यह कविता भी सहज-सरल-संप्रेषणीय और उद्वेलित करने वाली है.
    ओमप्रकाश कश्यप

  6. प्रिय मित्र रवि,
    आप ने हकीकत को न केवल अनुभव किया वरन कविता के माध्यम से उजागर भी कर दिया,इसके लिये बधाई.और आशा है कि अनुभव ऐकान्गी नहि रहेगा.

  7. बरसों पहले एक कविता लिखी थी… उसमें पसीने की गंध को मैंने भी दिलकश खुशबू बताया था… हम सब उसी पागलों की कतार मैं आते है… क्या करोगे … जवान खून है… एक उम्र तक यह पागलपन रहेगी…

    बहुत अच्छे… शुक्रिया…

  8. सलाम भाई रवि जी

    बहुत वर्षो के बाद एक बेहतरीन दिल को छू लेने वाली कविता पढ़ी
    ओर मेने वो गुनगुनाई ” चाहे मुझे पागल करार दिया जाए ”
    शुक्रिया बहुत बहुत शुक्रिया

  9. मुझे शक है रवि भाई ये कविता हाल की लिखी नहीं है |
    पढने के बाद सोचने से लगता है इसे आप ७ ,८ वर्ष पहले लिख चुके होंगे
    तो फिर ब्लॉग पर इतने समय बाद क्यों ?
    अच्छी रचनाएँ पढ़वाने में देरी क्यों ?

  10. रवि जी,
    बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर गया और आप की कविता “चाहे मुझे पागल करार दिया जाए” पढ़कर अभिभूत हुआ.
    कोई टिप्पडी करू इस लायक नहीं हाँ, एक एसी कविता की बार बार पढ़ने को मन करे बस.
    ० राकेश ‘सोऽहं’

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