जिन्हें नज़ाकत से जिया है मैंने

सामान्य

जिन्हें नज़ाकत से जिया है मैंने
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

nazakat

मैंने जिद्दोजिहद की हर पल से
और हार जाने से पहले
खू़ने-ज़िगर में डूबी उंगलियों से
फ़िज़ां में उकेरे कुछ ज़ज़्बात
वे हर दिल में गहरे पैठ गए
और कविता में मुन्तकिल हो गए

मैंने चाँद देखा
फिर महबूबा की आँखों की गहराई
मेरे दिल में हर शै के लिए
बेपनाह मुहब्बत पैदा हो गई
मैंने कैक्टस से चुने कुछ कांटे
और उन्हें चूम लिया
वे खिल कर गुलाब हो गए
और कविता में मुन्तकिल हो गए

मैंने आफ़तज़दा कारवां को
पानी पिलाया और राह दिखाई
इसी सबब मुझे जंजीरों से सजाया गया
और एक गोरकन को नशे में डुबोकर
जबरदस्ती तैयार किया गया
जब तक कब्र खुदती
मैंने बेतकल्लुफ़ी से हँसी लुटाई
और कु़र्बानगाह में फुसफुसाकर
अपने आप से की बेबाक गुफ़्तगूं
वह हर ख़ित्ते में गूंज गई
और कविता में मुन्तकिल हो गई

मैं ज़मीं के इस सिरे से दूसरे सिरे तक
बोने में जुटा हूं तमाम कविताएं
जिन्हें नज़ाकत से जिया है मैंने

जैसे ही वे अंकुराएंगी
एक लाल नदी
सैलाब आते दरिया में तब्दील हो जाएगी

०००००००
रवि कुमार

मुन्तकिल – स्थानान्तरित, परिवर्तित,  गोरकन – कब्र खोदने वाला
कु़र्बानगाह – बलिबेदी,  ख़ित्ते – इलाके

17 responses »

  1. जैसे ही वे अंकुराएंगी
    एक लाल नदी
    सैलाब आते दरिया में तब्दील हो जाएगी
    ==============
    जिद्दोजिहद की यह दास्तान बेहद उम्दा बन पडी है. एहसास का धरातल बहुत ऊंचा रखा है आपने.
    बहुत खूबसूरत

  2. तलाश रहा हूँ
    बहुत दिनों से
    कि इस की सानी की
    कोई नज्म
    और भी मिल जाए
    और उसे मेरे महबूब
    को नज्र कर दूँ
    अब तक नहीं मिली
    अब तलाश बंद
    इंतजार करते हुए
    टकटकी लगाए अपलक
    देख रहा हूँ वहीं
    जहाँ से ये नज्म आई थी
    वहीं से आएगी दूसरी भी

  3. आपकी प्रत्येक रचना मन को झकझोरती है, बहुत दिनों से सोच रहा हूं कि इंटरनेट पर उपलब्ध साहित्य के मूल्यांकन की जरूरत के बारे में, जिससे ऎसी रचनाओं को गंभीर और तथ्यपरक विमर्श के दायरे में लाया जाए, ताकि उनका दस्तावेजीकरण हो और कोयले की खदान से कुछ हीरे निकाले जा सकें. मगर यह कार्य नामवरी के लिए न होकर कामवरी के लिए किया जाना चाहिए.
    चुनौती हम सब के लिए भी है…
    ओमप्रकाश कश्यप

  4. ek prashan mera bhi kavi jo kavitaayen likhte wo dusron ke liye hoti hai ya kuchh selected logo ke liye aur kavi kya kabhi unhe apne jeevan men bhi karni ke roop men lete hai ya phir wo unki kathni hi kathni hoti hai
    prakash dalne ki kripa karen kyon ki men abhi tak jitne kavion ko janta hoon unki kathni aur karni men mail nahi paya

    aapki dwara likhit kavita ek lal nadi ka sailaab hai jo kabhi na kabhi jaroor dariya men tabdeel ho jayegi
    aameen………………………………………

  5. मैंने बेतकल्लुफ़ी से हँसी लुटाई
    और कु़र्बानगाह में फुसफुसाकर
    अपने आप से की बेबाक गुफ़्तगूं
    वह हर ख़ित्ते में गूंज गई
    और कविता में मुन्तकिल हो गई

    हर लम्हे को कविता बना दिया आपने… जिंदगी सफल हो गयी गुरु… आपको कैसे जोड़ सकता हूँ. कुछ उपाय बताइए… आप वर्डप्रेस से है और हम टेक्निकली कमजोर… बेहद उम्दा पोस्ट… वाकई सुबह सफल हो गयी

  6. आपकी इस कविता की रंगत देख कर पाकिस्‍तानी शायर अफ़जाल अहमद की बरसों पहले पढ़ी कविताएं याद हो आईं . आपका ब्लॉग देख कर बहुत अच्छा लगा . आपसे नहीं पर आपके पिता से बरसों से परिचित हूं .

  7. bhai ravi aap ko college ke jamane se jaanta hoon pata nahi aap ko yaad hai ki nahi……….par…ye sach hai…….sanjeeda kism ke to aap jab bhi the par itna talent ap me chupa hai kabhi ehsaas hi nahi hua……..par aaj is baat ka yakeen hi nahi varn eitmad bhi hai ki meara yaar jaroor falak ki us bulandi par pahoochega jaha se woh mujhe shayad is bheed me nazar andaz nahi kar sake………yogesh kaushik,,,,,,,,,aakhir me bus ek hi baat kehna chahta hoon ki………falak to woh he jo dikhta hai sabhi ko, falak me chand bhi hai deta hai jo sukun man ko, roshni se sarobaar suraj ..aur anginat sitarey…bus ek kami si hai wahan bina naam ke tumhare………sach aap ka naam ek din jaroor vaha hoga….

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