सूरज उगाया जाता फूलों में यदि – शमशेर बहादुर सिंह

सामान्य

सूरज उगाया जाता फूलों में यदि – शमशेर बहादुर सिंह
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, शमशेर बहादुर सिंह की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

बडे़ आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें……

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००००००००००

रवि कुमार

18 responses »

  1. रवि जी! मुझे तो आपही प्रभावित करते हैं आजकल।
    मैं अपनी
    शोला हो चुकी निगाहों के जरिए
    फ़लक की बुलन्दियों से
    फिर से मुख़ातिब होना चाहता हूं।
    आपका हिन्दी और उर्दू का यह प्रयोग मुझे जंचता है।

  2. शमशेर साहब भी नकारे हुए समाज और ज़रूरत पर विश्वास करने के लिए कविता सृजन आवश्यक समझते हैं..धूमिल,पाश,मुक्तिबोध,अज्ञेय{अज्ञेय शायद नहीं}, ये सभी एक लम्बी डगर पर चलने वाले कवि हैं,, कवि क्या हैं विरोध हैं, या एक उत्तेजना है,,जो अपने विरोध को अपने शब्दों में आने से नहीं रोक पाते हैं,इन सभी की कविता वास्तव में एक तीव्र उत्तेजना को हौले हौले शब्दों में ढालते हैं, क्यूंकि ये सभी समझते हैं,,कि ऐसी बातों को सीधे पटक देना अपने दाएं हाथ के खिलाफ खड़े होने जैसा है. और मुक्तिबोध चाहे अज्ञेय फेंटेसी से बातों को रंग रूप देते रहते हैं, मगर इनके अन्दर एक विरोध भरा ही रहता है..तभी तो ” ऐ इंसानों ओस न चाटो,अपने हाथों पर्वत काटो” या फिर ” साँप तुम तो सभ्य नहीं हुए “, जैसी रचनायें सामने आती हैं.मैं शब्द लोलुपता या फिर फेंटेसी को कम से कम इस अर्थ के लिए सही मानता हूँ..शमशेर कि इस कविता को चुनने के लिए धन्यवाद, ब्लॉग अच्छा है,, कलाकृति का भी अच्छा प्रयोग है, और कुल मिलकर ब्लॉग अच्छा है..

    इस सड़ी हुयी व्यवस्था को हमने यूँ स्वीकार कर लिया,
    जैसे मुंह में आये बलगम को फिर से गुटक लिया..

    “भूपेंद्र कौशिक”

  3. शमशेर साहब समाज की नकारी हुयी और जो वक़्त के अनुसार ज़रूरी है ऐसी बातों को उछालना ज़रूरी समझते हैं, इस कवायद में धूमिल,पाश,मुक्तिबोध,अज्ञेय {शायद अज्ञेय नहीं} आदि मुख्य कड़ी हैं, इनकी कविता कहीं कहीं बहुत तीखा विरोध है, वास्तव में ये विरोध ही है मौजूदा हालत के खिलाफ जिसे ये साहित्य के परदे में लपेटकर प्रस्तुत करते हैं, ऐसा इसीलिए ज़रूरी है की लोगों का साहित्य के प्रति विश्वास एवं आस्था जुडी रहे, और किसी व्यक्ति विशेष के कारण साहित्य से घृणा न हो जाये, तभी तो ” सांप तुम तो सभ्य नहीं हुए”या फिर ” ऐ इंसानों ओस न चाटो” जैसी कवितायेँ सामने आती हैं..शमशेर भी एक अत्यंत गंभीर हैं, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता ” मैं सूरज को डूबने नहीं दूंगा” फेंटेसी मैं लपेटा हुआ यथार्थ एवं मानव शक्ति का अद्भुत प्रदर्शन है, शमशेर की ये कविता भी यही तो कह रही है..और अगर किसी के पास विद्रोह है, तो उसे साहित्य,फेंटेसी एवं शब्द लोलुपता से जुड़ना ही होगा, नहीं तो उसे स्वीकार न करना लोगों की आदत मैं आ जायेगा..शमशेर की कविता का चयन आपने अच्छा किया है, और कलाकृति का क्या कहना..वाह..पूरा ब्लॉग जानकारी से अटा पड़ा है..
    निशांत कौशिक

  4. एक साथ सभी कार्य करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है मेरे भाई
    हमने भी सोचा था साथ साथ …………………………
    लेकिन कोई साथ नहीं रहा
    ओर शायद अकेले रहने से ही तरक्की होती हो, यह सोच कर सभी अलग होने लगे है तो | ये सशक्त कविता भी बेचारी सी लग रही है |
    क्षमा सहित अपनी प्रतिक्रिया दे रहा हूँ |

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