मैं समन्दर के बिना कामिल नहीं

सामान्य

मैं समन्दर के बिना कामिल नहीं
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)
samandar

मेरी बुलन्दियों से हमेशा
मुख़ालिफ़त रही
और गहराइयों के प्रति
मक़नातीसी खिंचाव

इसी सबब मुझसे
इक समन्दर दरयाफ़्त हो गया

ज़मीं मुझे बुलन्दियों के सिम्त
सफर पर देखना चाहती थी
और समन्दर मुझे
अपने में उतर आने की
ख़ामोश दावत दे रहा था

हवासबाख़्ता मैं
समन्दर किनारे ठगा सा रह गया

बुलन्दियों को फतह करना
शायद मेरी दस्तयाबी रहे
पर गर्तों में शिरकत करना
मेरे वज़ूद की एक उम्दा जरूरत है

लहर हो चुका मेरा दिल
समन्दर के साथ हिलौरें ले रहा है
समन्दर का नहीं होना
मेरे वज़ूद का नहीं होना है

मैं समन्दर के बिना कामिल नहीं

०००००
रवि कुमार

मुख़ालिफ़त – विरोध, मक़नातीसी – चुंबकीय, दरयाफ़्त – अविष्कृत, सिम्त – तरफ़, ओर
हवासबाख़्ता – किंकर्तव्यविमूढ़, दस्तयाबी – उपलब्धि, वज़ूद – अस्तित्व, कामिल – संपूर्ण, सर्वांगपूर्ण

14 responses »

  1. “बुलन्दियों को फतह करना
    शायद मेरी दस्तयाबी रहे
    पर गर्तों में शिरकत करना
    मेरे वज़ूद की एक उम्दा जरूरत है”

    यही है वह तरीका जो एकांगी न होकर समग्रता का विश्लेषण करता है . इस नवउदारीकरण के दौर में, बुद्धिजीवी के बौनेपन को दूर करने के लिए इसी तरह की रचनाओं की ज़रुरत है.

  2. लहर हो चुका मेरा दिल
    समन्दर के साथ हिलौरें ले रहा है
    समन्दर का नहीं होना
    मेरे वज़ूद का नहीं होना है

    waah bahut khub

  3. आपकी कविता को पढ़कर कुछ पंग्तियाँ जन्मी हैं, हालाँकि मैं बहुत छोटा हूँ.

    सोचता था
    लिखूंगा कविता
    समुन्द्र पर
    उस पर नतमस्तक
    आकाश पर
    लहराती लहरों पर
    लेकिन समुन्द्र
    जब से तुझे देखा है
    कुछ लिखनें को
    मन नहीं करता .
    [क्या इन शब्दों से आपके जेहन में कोई चित्र उभरता है रवि कुमार जी ]

    [] राकेश ‘सोऽहं’

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