शोला हो चुकी निगाहों के जरिए

सामान्य

शोला हो चुकी निगाहों के जरिए
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

n6

मैं नींद खोजता रहा
नींद एक ख़्वाब
बिल आखिर कंटीली झाड़ियों के इक सहरा में
मुझे नींद मिली
और वस्ल के ख़ामोश समन्दर की गहराई में
नींद को ख़्वाब

पर कंटीली झाड़ियों की नींद में
वस्ल का ख़्वाब
रेत के घर की मानिंद बिखर गया
रात को मिली उदासी
दिन को बेकरारी
मेरे हिस्से हिज़्र का रेगिस्तान आया
क्योंकि सब बेशुमार पानी चाहते थे

नागफनी के पौधे सा
मैं तरसता रहा
एक नाज़ुक छुअन के अहसास के लिए
मेरे अश्क जो बहते
जुगनू सा चमक कर रेत का ज़र्रा हो जाते
मैंने मोतियों की आस छोड़ दी

मैं चलना चाहता था
पर दरख़्त हो गया
और फलों से लद गया

मैं खिलना चाहता था
पर पत्थर हो गया
और बुत में ढ़ल गया

मैं दुनिया को
आगोश में लेना चाहता था
पर शून्य हो गया
और दुनिया की मुट्ठी में सिमट गया

मैंने तारे तोडने चाहे
चांद मुझसे खफ़ा हो गया

मैंने चांद को लपकना चाहा
सूरज मुझसे खफ़ा हो गया

मैंने सूरज को मसल देना चाहा
मेरे हाथ झुलस गये
और मैं
औंधे मुंह ज़मीं में धंस गया

मैं गहरा
और गहरा धंसना चाहता हूं
ताकि हो सकता है
मैं ज़मीं के दूसरे छोर पर जा निकलूं
और अपने पैरों पर फिर से
सीधा खडा़ हो जाऊं

मैं अपनी
शोला हो चुकी निगाहों के जरिए
फ़लक की बुलन्दियों से
फिर से मुख़ातिब होना चाहता हूं

०००००
रवि कुमार

9 responses »

  1. बहुत प्रभावी कविता।

    मैं गहरा
    और गहरा धंसना चाहता हूं
    ताकि हो सकता है
    मैं ज़मीं के दूसरे छोर पर जा निकलूं
    और अपने पैरों पर फिर से
    सीधा खडा़ हो जाऊं

    यही तो मैं भी चाहता हूँ।

  2. मैं नींद खोजता रहा
    नींद एक ख़्वाब
    बिल आखिर कंटीली झाड़ियों के इक सहरा में
    मुझे नींद मिली
    और वस्ल के ख़ामोश समन्दर की गहराई में
    नींद को ख़्वाब

    पर कंटीली झाड़ियों की नींद में
    वस्ल का ख़्वाब
    रेत के घर की मानिंद बिखर गया
    रात को मिली उदासी
    दिन को बेकरारी
    मेरे हिस्से हिज़्र का रेगिस्तान आया
    क्योंकि सब बेशुमार पानी चाहते थे

    बहुत अच्छे
    अच्छा सृजन

  3. bahut hi umda srijan
    मैं दुनिया को
    आगोश में लेना चाहता था
    पर शून्य हो गया
    और दुनिया की मुट्ठी में सिमट गया

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