हमारे पास और शामें नहीं

सामान्य

हमारे पास और शामें नहीं
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

n2

मैंने उससे कहा
मुझे तुमसे कुछ कहना है
उसने मेरी नज़रों को पढा़
और खिलखिलाकर हँस पड़ी
झडे़ हुए फूलों की महक से
मेरी जीभ बिंध गई
एक और शाम खा़मोश गुजर गई

मैंने उससे कहा
मुझे तुमसे कुछ कहना है
उसने मेरी सांसों की गर्मी को छुआ
और अपनी ठंडी हथेलियों से
मेरा चहरा थाम लिया
मुझे पाला पड़ गया
एक और शाम सर्द गुजर गई

मैंने उससे
एक बार फिर कहना चाहा
मुझे तुमसे कुछ कहना है
उसने आवाज़ की टूटन को भांप कर
मेरे कांपते लबों का बोसा लिया
और मेरे कान में फुसफुसाई
मैं जानती हूं मेरे सरताज़
उसकी मुंज़मिद नज़रों से
बिजली कड़की
और मैं जड़ हो गया

हमारे पास
यूं ही गुजार देने के लिए
अब और शामें नहीं बच रही थी

०००००
रवि कुमार

बोसा – चुंबन, मुंज़मिद – जमी हुई, ठहरी हुई

14 responses »

  1. शायद पहली बार आपके ब्लोग को देखा है कई रचनायें लगातार पढ गयी और पाया की इतनी बेह्तरीन रचनाओं से अब तक वंचित रही ये मेरा दुर्भाग्य था सुन्दर अद्भुत और सश्क्त रचनायें बधाई

  2. “झडे़ हुए फूलों की महक से
    मेरी जीभ बिंध गई”

    “उसने मेरी सांसों की गर्मी को छुआ
    और अपनी ठंडी हथेलियों से
    मेरा चहरा थाम लिया”

    “उसकी मुंज़मिद नज़रों से
    बिजली कड़की

    विरुद्धों का सामंजस्य कहूँ या प्रेम की उलटबासियाँ ?
    ज़रूर बताइए।

  3. ‘मैंने उससे
    एक बार फिर कहना चाहा
    मुझे तुमसे कुछ कहना है
    उसने आवाज़ की टूटन को भांप कर
    मेरे कांपते लबों का बोसा लिया
    और मेरे कान में फुसफुसाई
    मैं जानती हूं मेरे सरताज़
    उसकी मुंज़मिद नज़रों से
    बिजली कड़की
    और मैं जड़ हो गया

    हमारे पास
    यूं ही गुजार देने के लिए
    अब और शामें नहीं बच रही थी’

    अब और शामें नहीं बच रही थी इसका आशय यही है ना की शादी हो गयी
    या कुछ ओर …………………………………….
    अन्यथा न लेते हुए ……………………

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