पक चुकी आँखों की ताबिश

सामान्य

पक चुकी आँखों की ताबिश
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)
०००००

n9

जब कलम से रिसता लहू
जमने लगा हो
सफ़हात पर काला डामर सूखने
आँखों में रेगिस्तान ठहरा हो
और ज़ुबां पर लहलहाने लगे
नासूरों का सहरा

जब हमदर्दी की चाह लिए
अश्क भाप होने लगें
अदाएं खो रही हो अपना सरूर
और आहें दफ़्न हो जाए
किसी मिकानिकी तदबीर में

जब हवा चाँद पर जा छिपे
सूरज किसी दरख़्त के साये में
पानी ज़मीं की गोद में समा गया हो
और ज़मीं बिलआखिर
समन्दर की पनाह लेले

ऐसे ही वक्त के वाइस
ईज़ाद हुई है कविता

मैं उन सफ़हात से
जिन पर तहरीर हैं माकूल नज़्में
एक कश्ती दरयाफ़्त करूंगा
और समन्दर में उतर जाऊंगा

चाँद पर सूत कातती बुढ़िया की
पक चुकी आँखों की ताबिश
मुझे हौसला दे रही हैं

०००००
रवि कुमार

सफ़हात – पन्ने, सहरा – जंगल, मिकानिकी तदबीर – यांत्रिक कोशिश,
बिलआखिर – अंततः, ताबिश – चमक

13 responses »

  1. मैं उन सफ़हात से
    जिन पर तहरीर हैं माकूल नज़्में
    एक कश्ती दरयाफ़्त करूंगा
    और समन्दर में उतर जाऊंगा

    वाह वा..रवि जी…वाह…क्या ज़ज्बा है…बेहतरीन…लफ्जों की जादूगरी से क्या कमाल किया है आपने…जितनी तारीफ की जाये कम है…रचना के ऊपर दिया हुआ रेखा चित्र भी बेमिसाल है…
    नीरज

  2. “मैं उन सफ़हात से
    जिन पर तहरीर हैं माकूल नज़्में
    एक कश्ती दरयाफ़्त करूंगा
    और समन्दर में उतर जाऊंगा

    चाँद पर सूत कातती बुढ़िया की
    पह चुकी आँखों की ताबिश
    मुझे हौसला दे रही हैं”

    वाह भाई मजा आ गया क्या खूब सोच है

  3. बहुत अच्छा लिखते है भाई आप
    ओर आपकी लिखी ये पंक्तियाँ मुझे भी होसला दे रही
    ज़माने के साथ चलने ओर ज़माने को बेहतर बनाने के लिये

    आपको सादर नमन

    “चाँद पर सूत कातती बुढ़िया की
    पह चुकी आँखों की ताबिश
    मुझे हौसला दे रही हैं”

  4. “चाँद पर सूत कातती बुढ़िया की
    पह चुकी आँखों की ताबिश
    मुझे हौसला दे रही हैं”

    बड़े भाई पह पह चुकी आँखों की ताबिश जगह पक चुकी आँखों की तपिश तो नहीं आएगा
    खेर मुझे ताबिश का अर्थ नहीं आता
    क्षमा चाहूँगा
    लेकिन सही क्या है जरूर सूचित करें
    धन्यबाद

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