सूरज को डूबते देखना कोई सुंदर दृश्य नहीं हो सकता

सामान्य

अच्छा लगता है
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

n8

अच्छा लगता है
बच्चों को खिलखिलाते देखना
समन्दर को किनारों पर चढ़ते
चांद को बादलों के साथ के साथ
अठखेलियां करते देखना अच्छा लगता है

जब कोई कौंपल फूटती है
खिलती है कोई कली
जब सूर्य आंखें खोलता है
इठलाती किरणों के साथ
अच्छा लगता है
ज़मीन के ज़र्रे ज़र्रे का
जीवन की आभा से दमक उठना

ज़िंदगी को
जूझते और मुस्कुराते देखना
अच्छा लगता है

अच्छा नहीं लगता
किसी सितारे का टूटना
टूटना किसी आशा का
किसी फूल की पंखुरियों का बिखरना
बिखरना किन्हीं सपनों का
अच्छा नहीं लगता

भाई मेरे !
सूरज को डूबते देखना
कोई सुंदर दृश्य नहीं हो सकता
आल्हादित नहीं कर सकता हमें
एक दरख़्त को गिरते देखना

०००००
रवि कुमार

13 responses »

  1. जैसे बीज से अंकुर का फूटना
    पल्लवित हो कर पौधे और
    फिर वृक्ष में बदलना
    सत्य है।

    वैसे ही वृक्ष का जीर्ण होना
    उस की जड़ें खोखली होना
    और एक दिन उस का गिर जाना
    भी सत्य है।

    लेकिन इस से नहीं रुकता
    जीवन क्षण भर के लिए भी
    कोंपलें फूटती रहती हैं
    पौध बनती हैं
    और एक दिन
    वृक्ष बन जाती हैं।

  2. सुंदर सकारात्मक-भाव पूर्ण कविता! पर…
    डूबेगा नहीं सूरज तो उगेगा भी कभी नहीं, फिर कैसे अच्छा भाव पैदा होगा? जीवन की गति नकार० और सकार० के किनारों से बनी राह पर ही गतिशील है।
    सहिष्णुता नकार को स्वीकार से ही आती है। भागने से नहीं।

    • लगता है कविता अपनी बात को पूरी तरह संप्रेषित नहीं कर पाई है…

      इसमें सूरज के डूबने और दरख़्त के गिरने के सामान्य दृश्यों को प्रचलित नज़रिए से हट के देखने बाली बात सीधे और ज्यादा असर छोड़ कर रह जाती है…जिसमें कि मूल भाव के थोडा़ दबने की गुंजाइश थी…
      कविता का मूल भाव जो था, और जिस तक आसानी से पहुंचा जा सके..कहीं कोई कसर ना बाकी रह जाए…इसी को साफ़ दिखाने के लिए इसमें ये तीन पंक्तियां ठूंसी गयी थी :
      ०००
      ज़िंदगी को
      जूझते और मुस्कुराते देखना
      अच्छा लगता है
      ०००
      पर लगता है बात बनी नहीं…

      हालांकि मूल भाव को सीधे प्रत्यक्ष कर देना शायद कविता की कमजोरी होती है…
      क्योंकी ये पाठक से, उसकी चेतना के परिष्कार के अधिकार को छीन लेती है.

      पर फिर भी कविता की ये जिम्मेदारी है कि वह मूल संप्रेषण में कमजोर ना रहे…

      एक अच्छी सीख की संभावनाएं पैदा करने के लिए धन्यवाद…

  3. jaroori nahi ki sab apki kavita ya yoon kahe ki najariye se sahamat ho.
    kavita ka mool bhav kya tha pata nahi, kyounki mujhe padne ke bad uski jarorat nahi lagi
    kyuonki sayad mein esa sochta hoon ki ye ek sandar kavita hain.kyuonki ye prarit karti hain aage badne ki.

    • आदरणीय डॉक्टर साहब,

      बात सहमति या असहमति की नहीं है….आप जानते ही हैं….
      मूख्य बात यह है कि, बात पहुंची या नहीं….

      बात ना भी पहुंचे पर एक सार्थक आलोचनात्मक संवाद का वाइस बनें, यह भी एक तरह से बहुत महत्वपूर्ण बात है…

      आप जानते ही हैं, अच्छी रचना वही है जिससे गुजरने के बाद आप वही ना रहे जो कि इससे गुजरने के पहले थे…यानि कि हमारे अंदर कुछ ये बदलती हो या बदलने की प्रेरणा देती हो……

      रचना ने आपको प्रेरणा दी…टिप्पणियों ने आपको जुंबिश…
      और मुझे ये मौका कि में उसकी व्याख्या कर सकूं, अपनी बात रख सकूं….आपकी बात सुनने के लिए..

      धन्यवाद…..

  4. ज़िंदगी को
    जूझते और मुस्कुराते देखना
    अच्छा लगता है

    अच्छा नहीं लगता
    किसी सितारे का टूटना
    टूटना किसी आशा का
    किसी फूल की पंखुरियों का बिखरना
    बिखरना किन्हीं सपनों का
    अच्छा नहीं लगता

    maza aagaya bhai

    agar log in panktiyon ko padhkar unhe wo achchha lage jo is kavita ke maadhyam se bataya gaya hai aur unhen wo achchha nahi lage un sabhi ko jo is kavita ke maadhyam se bataya gaya hai to duniya bahut khoobsoorat ho jayegi

  5. रवि भाई,

    बर्टोल्ट ब्रेख्त की कविता का अनुवाद गत्यात्मक है ,अच्छा है.

    आपकी कविता ’ अच्छा नहीं लगता सूरज को डूबते हुए देखना ’ एक नव्य दृष्टिसम्पन्नता से युक्त है. मैं मानता हूं कि प्रत्येक दृष्टि की अपनी पृष्ठभूमि और भविष्य दृष्टि होती है. यही चीजें हैं जो व्यक्ति की पहचान बनती है।
    फिर भी प्रत्येक टिप्पणी सदैव एक नया विचार देकर जाती है।
    डॉ.रा.रामकुमार,

  6. कविता का अर्थ कवि न बताये तो अच्छा है, इसे पाठक पर छोड़ दिया जाना चाहिए और कम से कम सार्वजनिक रूप से कविता का अर्थ तो सही नहीं लगता।

    “अच्छी रचना वही है जिससे गुजरने के बाद आप वही ना रहे जो कि इससे गुजरने के पहले थे…यानि कि हमारे अंदर कुछ ये बदलती हो या बदलने की प्रेरणा देती हो…”

    अरे वाह! क्या बात है! लेकिन अगर राम को श्याम की कविता से गुजरने पर ऐसा कुछ नहीं लगा या हुआ तो जरूरी नहीं कि कविता अच्छी नहीं हो। इसका मापदंड एक पाठक नहीं हो सकता।

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