धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत ज्ञात कीजिए

सामान्य

धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत ज्ञात कीजिए – अष्टभुजा शुक्ल
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, अष्टभुजा शुक्ल की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

बडे़ आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें……

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०००००

रवि कुमार

9 responses »

  1. धर्म स्थलों के वीवाद में वर्षो से ऐसा हो रहा है
    किन्तु कुछ व्यक्ती वीशेष धर्मस्थलों को लेकर ये सब करते है या करवाते है
    उन्हें लोग या तो पहचान नहीं पाते या जानबूझकर नजर अंदाज़ कर देते है जीसका खामियाजा
    मनुष्यों को भुगतना पड़ता है मनुष्य से आप मेरे आशय जो मानव जाती के कल्याण की सोचता है ओर विभिन्न समुदाय ओर देश के उत्थान की बात करता है
    ये कवीता सोचने को मजबूर करती है की हम स्वार्थों की खातीर क्या क्या कर गुजरते है

    मैं आभारी हूँ आपका इस कविता को पढ़वाने के लिए ओर आपके रेखा चित्रों का कोई ज़बाब नहीं वाकई कविता में चार चाँद लगा देतें हें

  2. एक ज़ोरदार कवीता ओर एक ज़ोरदार पेशकश ओर कवीता को prabhav शाली बना देते है आपके रेखाचित्र तो धन्यवाद शुक्ल जी को ओर आपको

  3. शुक्ल जी अपनी कविता की तरह स्पष्ट हैं..आज ही उनसे फोन पर बात हुई.उनका बात करने का ढंग भी निराला है..संस्कृत हिंदी के अच्छे खासे विद्वान् हैं..और ये जो कविता है..ये कविता नहीं एक आक्षेप है,,,सिर्फ धर्म नहीं..उन सामूहिक चिंतन के लिए भी जो “धर्म” शब्द की जगह रखे जा सकते हैं..

    Nishant kaushik

  4. “आओ बतलाएँ तुम्हें, सब धर्मों का मर्म। धर्म धर्म जपते रहो, करते रहे अधर्म॥”

    अपनी ही एक कविता याद आई जिसमें आदमी के बीच आदमी का प्रतिशत गणित से निकाला गया था। …वैसे धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत नकारात्मक में है शायद। लेकिन सब कहते हैं यही धारण करने योग्य है। बस आवरण से ढका है यह असली चेहरा।

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