लमही के लम्हे

सामान्य

लमही के लम्हे

(photographs of lamahee by ravi kumar, rawatbhata)

गत १४ अप्रेल को बनारस प्रवास के दौरान मुंशी प्रेमचंद के पैतृक गांव लमही जाने का अवसर मिला. कुछ लम्हे छायाचित्रों के रूप में प्रस्तुत हैं. उनके पैतृक आवास को ढहा कर प्रेमचंद स्मारक बना दिया गया है, उनके बाद के आवास का जीर्णोद्धार कर उसे चमका दिया गया है. गांव के रास्ते पर एक भव्य प्रवेशद्वार बनाया गया है, जहां उनकी कहानियों के पात्र मूर्त हैं. गांव का भी कायाकल्प हो गया है. गांव के बीच का ताल अब जीर्णोद्धार के बाद प्रेमचंद सरोवर हो गया है. उनके स्मारक और घर के ठीक सामने एक भोलेनाथ का मंदिर खडा़ हो गया है, जिस के चौबारे में पांच-सात त्रिशूल रोप दिये गये हैं. गांव के लोग किसी न किसी रूप में उनके नाम के साथ जुडकर अपनी पहचान खोज रहे हैं. आप को भी लग रहा होगा और मैं भी समझ नहीं पा रहा हूं कि यह वस्तुस्थिति का जिक्र हो रहा है या कोई व्यंग्य. कुल मिला कर यह कि प्रेमचंद कहीं नहीं दिखे न ही वह प्रेमचंदपना. खैर, जरा छायाचित्र देखते हैं…….

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यह है मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही का प्रवेशद्वार

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प्रवेशद्वार के बांयी तरफ़ का दृश्य

प्रवेशद्वार के दांयी तरफ़ का दृश्य

प्रवेशद्वार के दांयी तरफ़ का दृश्य

प्रेमचंद का पैतृक आवास जिसे ढहा कर प्रेमचंद स्मारक बना दिया गया है, बांयी तरफ़ वह जीर्णोद्धार किया हुआ घर जहां प्रेमचंद बाद में रहे थे

प्रेमचंद का पैतृक आवास जिसे ढहा कर प्रेमचंद स्मारक बना दिया गया है, बांयी तरफ़ वह जीर्णोद्धार किया हुआ घर जहां प्रेमचंद बाद में रहे थे

स्मारक के अंदर के कमरे, जहां कुछ स्मृति चिन्ह हैं और प्रेमचंद का साहित्य भी

स्मारक के अंदर के कमरे, जहां कुछ स्मृति चिन्ह हैं और प्रेमचंद का साहित्य भी उपलब्ध है

स्मारक का पीछे का हिस्सा जहां प्रेमचंद की छतरीस्थ आवक्ष प्रतिमा लगी हुई है

स्मारक का पीछे का हिस्सा जहां प्रेमचंद की छतरीस्थ आवक्ष प्रतिमा लगी हुई है

प्रेमचंद की आवक्ष प्रतिमा

प्रेमचंद की आवक्ष प्रतिमा

प्रेमचंद की हिन्दी हस्तलिपी

प्रेमचंद की हिन्दी हस्तलिपी

प्रेमचंद की उर्दू हस्तलिपी

प्रेमचंद की उर्दू हस्तलिपी

प्रेमचंद सरोवर

प्रेमचंद सरोवर

छायाचित्र द्वारा रवि कुमार, रावतभाटा

11 responses »

  1. मैं प्रेमचंद नामधारी होने के बावजूद कभी लमही नहीं गया, आपकी तसवीरें देख कर लगा यह सब १२५ वीं जयन्ती के अवसर पर हुआ काम है. लेकिन मुझे प्रेमचंद के आसपास मंदिर जैसी चीज़ों से कोफ्त होती है, यह “ईदगाह” वाले प्रेमचंद के लिए उपयुक्त नहीं लगता.

  2. इन चित्रों के माध्यम से प्रेमचंद के गांव की सैर हम ने भी कर ली। सुखद अनुभव हुआ। कुछ बरस पहले इसी गांव में उन की प्रतिमा की दुर्दशा देख कर मन बहुत दुखी हुआ था।

  3. ये खबर और चित्र दिखाकर आपने बडा अच्छा किया। इसी बहाने हम भी लमही हो आये वरना कहां हम पहुंच पाते इस भागदौड में। वैसे प्रेमचंद के गाँव को चित्रों में देख और विवरण पढ वैसा ही लग रहा है जैसे कि लैब में कोई पक्षी आदि की जान लिकालकर उसे केमिकल आदि लगाकर संरक्षित अवस्था में रखकर एक स्थिर आकार दे रख दिया गया हो कि ये है फलाना पक्षी…ये है फलांना प्राणी।
    चलते फिरते होरी, गोबर , ठाकुर, निर्मला अब प्रेंमचंद के गांव में न मिलें क्योंकि वे सीमेंट के कोठार में संरक्षित हैं…..उन्हें देखने के लिये अब सुदूर देहात में जाना पडेगा।

    जानकारी के लिये धन्यवाद।

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