मैं ख़ुदाओं के बीच सो रहा

सामान्य

मैं ख़ुदाओं के बीच सो रहा
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)


jkhh

उसने मुझसे
ख़ुदा के नूर के बारे में पूछा
मैंनें उसे आईना दिखा दिया


उसने ख़ुदा की पनाहगाह का पता मांगा
मैं फुटपाथ पर उकडू पडे
ख़ुदाओं के बीच जाकर सो रहा

उसने ख़ुदा की नसीहतों की जानकारी चाही
मैंनें उसे गले से लगा लिया
और उसकी आंखों का समन्दर पी गया

उसने मुझसे शैतान के बारे में पूछा
और जहन्नुम की अज़ीयतों को जानना चाहा
इससे पहले कि मेरी ज़ुबां राज़ खोलती
वह वहशतज़दा हो गया

मैंनें उसकी पथराई आंखों में
शिखा से बंधा भगवा
गुंबद में निकली दाढ़ी
और संगीनों का ख़ौफ़नाक़ साया देखा
ख़ामोशी के तेवर
उसकी वाक़फ़ियत का इजहार कर रहे थे

उसने मुझे
एक सरकंडे़ की कलम हदिया की
और जन्नत का मज़ा लूटना चाहा

मैंनें उसे एक पूरी रोटी पेश कर दी
वह उसे छाती से चिपकाकर
चैन की नींद सो गया

उसके कीचड़ और बिबाईयों से सजे पैर
माबद पर
इनायत फरमा रहे थे


०००००
रवि कुमार

अज़ीयतों – यातनाओं,  वाक़फ़ियत – जानकारी
हदिया की – उपहार में दी,  माबद – इबादत करने का स्थान.

12 responses »

  1. bhai aap khudaon ke beech men so gaye the is liye men khudaon ke bagal men so gaya aur aapse khuda ke baaren main poochhne ki jaroorat hi nahi padi kyon ki men bhi to khuda ke bagal men hi tha na

    kaho kaisi rahi

    anyatha na lena

    kavita waakai sochne par majboor karti hai

    dhanybaad aapko

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