एक नए जहां का आग़ाज़

सामान्य

एक नए जहां का आग़ाज़
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

मैं एक नदी को
मुंजमिद होते नहीं देख सकता
और ना ही एक आफ़्ताब पर
बादलों का साया चस्पा होते

मैं आग की एक कश्ती बनाउंगा
हौसलों के चप्पू
फिर तुम्हें साथ लेकर
एक मुसल्सल
सफ़र पर निकल जाऊंगा

मादूम होते ख़्वाबों से परे
हमारे दिल ढूंढ़ ही लेंगे शायद
कोई पुरसुकून मुक़ाम
मुंजमिद नदी पिघलती जाएगी

हम अपने पसीनें की बूंदों से
एक नए जहां का आग़ाज़ करेंगे
बोसों की गर्मी से एक आफ़्ताब
रोटी की ठण्डक से एक चांद
नज़रों की चमक से
एक कुतुब सितारा ईजाद करेंगे
और तुम्हारे आंचल के आसमान पर
इन्हें नज़ाकत से सजा देंगे

हम उस पल का जश्न मनाएंगे
जब पहली बार तुम्हारे गालों पर
सुर्खी छाई थी
और तुम गुलाब सी महक उठी थी

मैं हवा का साथ चाहता हूं
और बादलों की ओट से आफ़्ताब को
फिर से दमकता देखना

नदी और समन्दर के विसाल को
कोई मुज़ाहमत नहीं रोक सकती
और ना ही कोई हस्सास अस्लाह
गुलाब से महक को जुदा कर सकता है

मैं नदी की ताकत को जानता हूं
और आफ़्ताब के तेज़ को भी

०००००
रवि कुमार

मुंजमिद- जमी हुई, चस्पा- चिपका हुआ
मुसल्सल- अनवरत, लगातार, मादूम- नष्ट
कुतुब सितारा- ध्रुवतारा, विसाल- मिलन, मुज़ाहमत- बाधा
हस्सास अस्लाह- सूक्ष्म हथियार

7 responses »

  1. Apne dimag ke kachre ko khubsurat shabdo ke wrapper me sajakar logo ke samne pesh kar dad pana chahte ho,Kavi ki kalpana aur yatharth me jameen asman ka fark hota hai,Tumare andar ki atirik urja ko tum shabdo ke madyam se vayakt kar rahe ho jise vayakt karna tumari apni vayatigat majburi hai jise agar tum nahi karoge to tumaraa dimag tume chain se nahi baitne dega aur shayad tum mansik rogi ho jao,apni mansik avastha ke liye dad pana chahte ho.
    Mere vichar se agar tum apne samay ka sadupayog 1 vaykti ki samsaya (Rozi,Roti aur maviya mulya)ko hal karne Ka prayatna karo use sammaniya aur sanskarwan nagrik banane ki prena do to tumara hi anusaran kar prateyak vaykti aisa hi kare to sari sari samsya dur ho sakti he aur khushali aa sakti he per iske liye sayanm aur dhariya va lagan ki jarrorat hoti he jise tume abhi sikhna he(tumari kavita ko dekhar aisa hi lagta he)
    Prukriti tumari kalpana se bhi kahi adhik shaktishali he vah apna rasta khud dundti.
    Anyway Best Regard Aise hi likhar apna man halka va dimag shant karte raho
    sunil

    • यथार्थ और कल्पित विकल्प की असामनता,द्वंद या अंतर्विरोध ही हर नवीन सृजन का कारक होता है.यथार्थ से असंतुष्टि हमें नये विकल्प तलाशने की उर्जा देती है, और इस हेतु हमारे प्रयास हमें अपने अस्तित्व और उसकी उपयोगिता का का अहसास कराते हैं………………
      और क्रियाकलापों को फिलहाल छोडें, यदि कविता ये काम कर पा रही है तो सभी को यह मुबारक…..वर्ना आज के हालात तो सभी को मानसिक रोगी बनाने पर तुले हुए हैं…

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