मैं जाग रहा होता हूँ रात रात

सामान्य

मैं जाग रहा होता हूँ रात रात

जबकि सभी लगे हैं
इमारतों की उधेड़बुन में
मैं एक बुत तराश रहा हूँ

जबकि कांटों की बाड़ का चलन
आम हो गया है
मैं महकते फूलों की
पौध तैयार कर रहा हूं

जबकि सभी चाहतें हैं
आसमानों को नापना
मैं गहराईयों को टटोल रहा होता हूं

यह अक्सर ही होता है
लोग समन्दर पी जाते हैं
मैं चुल्लू बनाए
झुका रह जाता हूं

या कि जब लोग सोए होते हैं
हसीन ख़्वाबों में खोए
मैं जाग रहा होता हूं रात रात
मैं कर रहा होता हूं कविता

-रवि कुमार

5 responses »

  1. Mere bhai ye “Mai “chodkar “hum” per likhana shuru karo.Mai se ahankar pradarsit hota he,sab agar mai-mai karne lage to phir duniya kaise chalehi.Tum bi hum jaise hi ho bhai bus sirf fark itna he ki tumhe shabdo ko khubsurat tarike se pirona ata he.

    • हमें हम ही होना चाहिये……..
      परंतु बिना “मैं” की संपूर्ण यात्रा के, सही मायनों में “हम” तक पहुंचना संभव ही नहीं है….
      मैं यानि एक व्यक्ति, और हम यानि संपूर्ण समाज के आपसी द्वंद और अंतर्संबंधों को समझे बगैर हम अपनी भूमिकाओं का सही निर्धारण नहीं कर सकते…..

  2. रवि साहब आपके सरोकार फिर से याद दिलाते हैं कि रास्ता भूलो नहीं. आपके पोस्टर और मुखर कवितायेँ कालजयी हों. ऐसे ही जब सब सो रहे होंगे तब नींद का मोल कुछ न मिलेगा मगर जग कर लिखी हुई एक कविता बोलती – बुलाती रहेगी साल दर साल…. मुझे खुशी होती है ऐसी कवितायेँ पढ़ कर कि ये कवितायेँ नारे नहीं लगाते हुए भी मनुष्य के सुख और दुःख को उसके निजी और सार्वजनिक को सामान रूप से शब्द देती हैं. बहुत बधाई !

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