हरीश भादानी जी नहीं रहे. कल २ अक्टूबर को उनका निधन हुआ.
जो उन्हें जानते हैं, वे सब जानते ही हैं.
वे जन-आंदोलनों के प्रिय जनकवि रहे हैं. कई कला-विधाओं के जरिए जन-जन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने और जागॄति की अलख जगाने वाले, बीकानेर (राजस्थान) के भादानी जी सामाजिक व राजनैतिक जागरुकता के लिए सदैव संघंर्षरत रहे.
उनका एक गीत हम बचपन में खूब गाया करते थे:
रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है
बोले खाली पेट की, करोड़-करोड़ कुंदियां
खाकी वर्दी वाले भोपें, भरे हैं बंदूकियां
राज के विधाता सुन, तेरे ही निमत हैं
रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है
०००००
आज की यह कविता उन्हीं की स्मृति को समर्पित।
समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता
( a poem by ravi kumar, rawatbhata)
समन्दर
कभी ख़ामोश नहीं हुआ करता
उस वक़्त भी नहीं
जबकि सतह पर
वह बेहलचल नज़र आ रहा हो
लाल क्षितिज पर सुसज्जित आफ़ताब को
अपने प्रतिबिंब के
समानान्तर दिखाता हुआ
बनाता हुआ
स्याह गहराते बादलों का अक़्स
उस वक़्त भी सतह के नीचे
गहराइयों में
जहां कि आसमान
तन्हाई में डूबा हुआ लगता है
एक दुनिया ज़िन्दा होती है
अपनी उसी फ़ितरत के साथ
जिससे बावस्ता हैं हम
कई तूफान
करवटें बदल रहे होते हैं वहां
कई ज्वालामुखी
मुहाने टटोल रहे होते हैं वहां
ज़िंदगी और मौत के
ख़ौफ़नाक खेल
यूं ही चल रहे होते हैं वहां
उस वक़्त भी
जबकि समन्दर
बेहद ख़ामोश नज़र आ रहा होता है
०००००
रवि कुमार








M Verma said,
October 3, 2009 at 8:21 PM
समन्दर
कभी ख़ामोश नहीं हुआ करता
सही कहा है समन्दर खामोश नही होता.
जिन्दगी भी शायद –
बेहतरीन रचना. सत्य को उकेरती.
दिनेशराय द्विवेदी said,
October 3, 2009 at 8:37 PM
रवि! बहुत ही काबिल श्रद्धांजलि है यह कविता। वाकई समंदर कभी खामोश नहीं होता।
विवेक said,
October 3, 2009 at 8:42 PM
आपकी इस श्रद्धांजलि में एक आहूति मेरी भी…
lalit sharma said,
October 3, 2009 at 8:53 PM
समंदर कभी खामोश नही होता । समदर कभी मरता भी नही है,उसकी गर्जना ही उपस्थित रहने का अह्सास है,मेरी भी जन कवि को सादर श्रद्धांजलि,
premalata pandey said,
October 3, 2009 at 8:59 PM
sunder prastuti!
विजय गौड said,
October 3, 2009 at 10:10 PM
विनम्र श्रद्धांजलि ।
koshi said,
October 3, 2009 at 10:14 PM
दिल को छू गई
kshama said,
October 3, 2009 at 10:27 PM
समंदर कभी खामोश नही होता …पर समंदर -सी आँखों को खामोश होते देखा है ..समंदर -से दिलको डूबते देखा है …अपनी ही खामोशी साथ लिए ..तूफानों को करवटें बदलते देखा है …ज़िंदगी तबाह करके निकल जाते हैं …और पीछे सिसकती खामोशियाँ छोड़ जाते हैं ..आपके जज्बों को नमन ..!
ashok said,
October 3, 2009 at 10:56 PM
hamarii bhii shraddhanjali aur lal salaam..
sharad kokas said,
October 4, 2009 at 1:59 AM
रवि जी , हरीश जी ने वातायन मे मेरी कविताये छापी थी और उस वक्त उनसे पत्रव्यवहार हुआ था । उनका जाना बहुत दुख दे रहा है ।
संदीप said,
October 4, 2009 at 10:10 AM
हरीश जी को श्रद्धांजलि। यह कविता ऐसे समय में आपकी और जनआंदोलनों से जुड़े सभी लोगों की भावनाओं को व्यक्त करती है।
अनूप शुक्ल said,
October 4, 2009 at 12:26 PM
विनम्र श्रद्धांजलि ।
mahendra mishra said,
October 4, 2009 at 9:40 PM
समन्दर
कभी ख़ामोश नहीं हुआ करता
सही कहा है समन्दर खामोश नही होता.
जिन्दगी भी शायद –
बेहतरीन रचना
गिरिजेश राव said,
October 5, 2009 at 7:42 AM
श्रद्धांजलि
Saagar said,
October 5, 2009 at 11:28 AM
इसे शीन काफ निजाम के समंदर पर के नज्मों में ९ वां स्थान दे दूँ… आठ तो वो खुद लिख चुके हैं…
loksangharsha said,
October 5, 2009 at 9:00 PM
समन्दर
कभी ख़ामोश नहीं हुआ करता.nice
bhagat said,
October 6, 2009 at 1:33 PM
आपके ब्लॉग के सभी पाठको के साथ साथ
और आपके द्वारा दी गयी श्रद्धान्जली में आप सभी के साथ हूँ और साथ ही एक बहुत बड़ी कमी हो गयी है काव्य जगत में
एक जनकवि का जाना बहुत ही खलता है |
उस पर आपकी कविता दिल को छू लेती है
“समंदर कभी खामोश नहीं होता
उस वक़्त भी नहीं
जबकि सतह पर
वह बेहलचल नज़र आ रहा हो
लाल क्षितिज पर सुसज्जित आफ़ताब को
अपने प्रतिबिंब के
समानान्तर दिखाता हुआ
बनाता हुआ
स्याह गहराते बादलों का अक़्स”
Devi nangrani said,
October 8, 2009 at 10:41 PM
शोर है खामोशिओं को सुन न पाए गौर से
अपने अंतर्मन की भाषा हम कभी पड़ न सके
उम्मीद से बढकर रचनात्मक सोचों का सिंगार है यह रचना
देवी नागरानी
राकेश 'सोहम' said,
October 9, 2009 at 1:26 PM
हरीश भादानी जी की स्मृति में समर्पित आपकी कविता ‘समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता’ और शब्द चित्र मन में गहरे उतर गई, जहाँ वास्तव में हलचल सी मच गयी .
हमारी मौन श्रद्धांजलि .
सच के बहुत करीब यह कविता – एक श्रेष्ठ रचना कर्म और श्रेष्ठ विचार .
‘यदि विचार श्रेष्ठ हो तो कर्म अनिवार्य रूपेण श्रेष्ठ हो जाता हैं. श्रेष्ठ विचार अनिवार्य रूपेण श्रेष्ठ कर्म के जन्मदाता बनते हैं [ओशो]