घूम रहे हैं राजपथों पर डाकू अंगुलीमाल – नागार्जुन
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)
शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.
इस बार का कविता-पोस्टर है, नागार्जुन की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.
बडे़ आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें……
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रवि कुमार








दिनेशराय द्विवेदी said,
September 19, 2009 at 9:03 PM
बाबा की ये चार पंक्तियाँ मौजूदा व्यवस्था का संपूर्ण चित्रण करती हैं। पोस्टर का चित्र उसे और भी स्पष्ट कर देता है। बस अर्थचक्र को इस में स्पष्ट करने की और आवश्यकता रह गई है।
lalit sharma said,
September 20, 2009 at 7:52 AM
आपके चित्रण की खूबसूरती देखकर दिल खुश हो जाता हैं,शब्द+रेखांकन का सुन्दर समन्वय हैं, बधाई हो, जय हो,
arvind mishra said,
September 20, 2009 at 8:42 AM
लाजवाब !
loksangharsha said,
September 20, 2009 at 2:47 PM
घूम रहे हैं राजपथों पर डाकू अंगुलीमाल .nice
गिरिजेश राव said,
September 20, 2009 at 3:22 PM
ऐसी हर चीज जो चेतना को कुरेदती हो वह दीवार पर टँगने और मूर्ति हो कबूतरों की बीट बटोरने के लिए क्यों अभिशप्त हो जाती है ? मनुष्य की लिप्सा इतनी प्रबल क्यों है?…..
अर्थ के अनर्थ जाल पर कभी मैंने 3 लेखों की एक श्रृंखला लिखी थी। फुरसत मिले तो पढ़िएगा।
sarwat m. jamal said,
September 20, 2009 at 4:22 PM
भैया बड़ा सटीक चित्रण किया है ,बधाई
alka mishra said,
September 20, 2009 at 4:25 PM
मुझे तो अंगुलीमाल की वास्तविक फोटो साइड बार में दिखायी दे रही है
एक बार आप भी देख लो
shashi said,
September 22, 2009 at 1:49 PM
बाबा की कविता ओर आज का वर्तमान
बहुत ही सुन्दर
Arshia said,
September 22, 2009 at 4:43 PM
जीवन की विद्रूपताओं को बहुत सलीके से बयां किया है आपने।
( Treasurer-S. T. )
satyanarayan soni said,
September 22, 2009 at 6:18 PM
raviji, vah! kavitaon ka chayan aur chitrankan bahut achcha laga. har aakriti aur shabad aandolit karne me saksham hain. -satyanarayan soni, parlika