आसमान फिर सिमट रहा है

आसमान फिर सिमट रहा है
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

n2

आसमान जब भी उतरता है धरा पर
उसके पास होते हैं
सूरज, चाँद, सितारे
और एक असीमित फैलाव
उन्मुक्त उड़ान के लिए

धरा
चाँद सितारों से दमकती
अनन्त ओढ़नी को
क्षण भर भी अपने पर
लिपटे रहने के रोमांच में
अभिभूत हो उठती है

इस अभिभूत क्षण में
आसमान सिमटता है चुपचाप
झुकता है तेजी से
और धरा में समा जाता है

जब तक धरा
लौटती है आपे में
आसमान फैल चुका होता है
वैसे ही
दूर बहुत दूर
उसी निर्लिप्तता से

और धरा
एक हसीं ख़्वाब टूट जाने की तरहा
ठगी सी रह जाती है

हमें ऐसा ही लगता है
कितना मधुर मिलन हो कर चुका है
क्षितिज पर
धरा और आसमान का

उफ़
आसमान फिर से सिमट रहा है
एक और क्षितिज पर…

०००००
रवि कुमार

17 Comments

  1. Dr Anurag said,

    September 15, 2009 at 8:28 PM

    अद्भुत ….ओर सौन्दर्य से भरपूर …

  2. lalit sharma said,

    September 15, 2009 at 8:34 PM

    रवि जी बहुत सुन्दर कविता है

    जब आसमान धरा पर उतरना है
    तो धरती को भी तो संवरना है
    जनम लेगा एक क्षितिज नया
    ये मिलना तो एक बहाना है

  3. September 15, 2009 at 8:38 PM

    क्या सचमुच उतरता है आसमान धरा पर?
    या सिर्फ छलावा है
    छिन भऱ का?

  4. meenu khare said,

    September 15, 2009 at 9:01 PM

    उफ़
    आसमान फिर से सिमट रहा है
    एक और क्षितिज पर…

    बहुत सुन्दर कविता …

  5. M Verma said,

    September 15, 2009 at 9:02 PM

    और धरा
    एक हसीं ख़्वाब टूट जाने की तरहा
    ठगी सी रह जाती है
    आपकी रचनाए अलग अन्दाज़ मे बहुत कुछ कह जाती है.
    बहुत सुन्दर

  6. September 15, 2009 at 9:13 PM

    और धरा
    एक हसीं ख़्वाब टूट जाने की तरहा
    ठगी सी रह जाती है.nice

  7. September 16, 2009 at 1:20 AM

    बेहतरीन!!

  8. mehek said,

    September 16, 2009 at 11:31 AM

    bahut sunder

  9. Saagar said,

    September 16, 2009 at 11:32 AM

    कल्पना की अद्भुत उड़ान! ब्लॉग पर तो बहुत कम देखने को मिल रहे हैं… इसके लिए किताबों का आसरा लेना पड़ता है… जोड़-तोड़ का ताना-बना, ख्यालों का बानगी… वाह !

  10. bhagat said,

    September 16, 2009 at 3:15 PM

    और धरा
    एक हसीं ख़्वाब टूट जाने की तरहा
    ठगी सी रह जाती है

    उफ़
    आसमान फिर से सिमट रहा है
    एक और क्षितिज पर…

    ek behtreen abhivykati

  11. pallavi trivedi said,

    September 16, 2009 at 5:07 PM

    बहुत सुन्दर लिखा है….बहुत दिनों बाद एक अच्छी कविता पढ़ी!

  12. jayantijain said,

    September 16, 2009 at 8:07 PM

    great expressions

  13. ashok said,

    September 17, 2009 at 12:54 AM

    यह कविता भी उत्तम

  14. September 17, 2009 at 7:08 PM

    इस कविता को पढ़कर आसमान को मैनें अपने में सिमटते देखा है ???

    “…….कितना मधुर मिलन हो कर चुका है
    क्षितिज पर
    धरा और आसमान का…..”

    अंतर्मन की अतल गहराई में उतर गई ये कविता.

  15. September 17, 2009 at 9:15 PM

    अच्छी प्रस्तुति….बहुत बहुत बधाई…
    मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग “मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी”में पिरो दिया है।
    आप का स्वागत है…

  16. September 19, 2009 at 12:12 PM

    आपके ब्लॉग की चमक-सज्जा बहुत मोहक है जी।

  17. sharad kokas said,

    October 8, 2009 at 2:28 PM

    पृकृति को विज्ञान की आँख से देखने का यह उपक्रम बढ़िया है ।


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