रात के अंधेरे ही सही – अनीस इमाम
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)
शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.
इस बार का कविता-पोस्टर है, अनीस इमाम की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.
बडे़ आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें……
००००००००
रवि कुमार








दिनेशराय द्विवेदी said,
August 29, 2009 at 8:06 PM
एक जबर्दस्त रचना को चित्रित करने के लिए बधाई!
सुशील कुमार छौक्कर said,
August 29, 2009 at 10:20 PM
सच्ची और गहरी बात। बहुत खूब।
M Verma said,
August 29, 2009 at 10:57 PM
बेहतरीन
vipingoyal said,
August 30, 2009 at 1:12 AM
बहुत खूब
loksangharsha said,
August 30, 2009 at 10:41 AM
nice
राकेश 'सोऽहं' said,
August 30, 2009 at 10:53 AM
आपकी शब्दों को चित्रों में उतारने की कला अद्भुत है. रचना को आपके चित्र के साथ पूर्णता को प्राप्त होती है.
हर चीज़ पूर्ण होने में लगी है. उसे रास्ता चाहिए [ओशो]
आप रचनाओं को रास्ता देते हैं.
अनोखी कला को सलाम !
० राकेश ‘सोहम’
ashok said,
August 31, 2009 at 10:05 AM
इस रात को हम अंधेरों के ख़िलाफ़ मुसलसल जंग करते हुए ही तमाम करेंगे।
आपके पोस्टर रूबरू देखने और मह्सूस करने की बहुत तमन्ना है।
ashok said,
August 31, 2009 at 10:09 AM
हां आर्थिक मुद्दों पर रुचि हो तो देखियेगा
http://economyinmyview.blogspot.com
bhagat said,
August 31, 2009 at 12:01 PM
अनीस इमाम जी एक बेहतरीन कविता और आपके द्वारा उसकी उतनी ही सार्थक सचित्र अभिव्यक्ति
आपको बहुत बहुत धन्यबाद रवि जी
Saagar said,
August 31, 2009 at 12:30 PM
बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आशा और उम्मीद दिखाई दे रहा हैं… लौ जलाये रखिये…
Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष said,
September 1, 2009 at 12:40 AM
क्या इससे पहले आशा और उम्मीद नहीं थी ? इंकलाब था ! और क्या इंकलाब आशा नहीं ?
Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष said,
September 1, 2009 at 12:43 AM
“रात फिर रात है, सूरज से दहल जाती है” – यह दर्शन है, जीवन का सार है ! कुछ नहीं रहता, न दुख रुकता है न सुख रुकता है ।
Syed Akbar said,
September 2, 2009 at 10:50 PM
एक बेहतरीन रचना को आपकी कला ने और ऊंचाई पर पहुंचा दिया.
विनय said,
September 3, 2009 at 4:13 PM
बेहतरीन रचना है!
अफ़लातून said,
September 3, 2009 at 9:57 PM
जितनी सशक्त कविता उतना ही जोरदार पोस्टर । जिन्दाबाद ।
chandrapal said,
September 4, 2009 at 12:30 AM
बेहद सुंदर कविता और उससे भी रचनात्मक आपका पोस्टर. शिवराम जी से मुम्बई में मुलाकार हुई थी. उन्हें याद किजियेगा.
ajay sinha said,
September 5, 2009 at 2:10 AM
बहुत अच्छा! कितनी जोरदार बात है!!