हमारे पास और शामें नहीं
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)
मैंने उससे कहा
मुझे तुमसे कुछ कहना है
उसने मेरी नज़रों को पढा़
और खिलखिलाकर हँस पड़ी
झडे़ हुए फूलों की महक से
मेरी जीभ बिंध गई
एक और शाम खा़मोश गुजर गई
मैंने उससे कहा
मुझे तुमसे कुछ कहना है
उसने मेरी सांसों की गर्मी को छुआ
और अपनी ठंडी हथेलियों से
मेरा चहरा थाम लिया
मुझे पाला पड़ गया
एक और शाम सर्द गुजर गई
मैंने उससे
एक बार फिर कहना चाहा
मुझे तुमसे कुछ कहना है
उसने आवाज़ की टूटन को भांप कर
मेरे कांपते लबों का बोसा लिया
और मेरे कान में फुसफुसाई
मैं जानती हूं मेरे सरताज़
उसकी मुंज़मिद नज़रों से
बिजली कड़की
और मैं जड़ हो गया
हमारे पास
यूं ही गुजार देने के लिए
अब और शामें नहीं बच रही थी
०००००
रवि कुमार
बोसा – चुंबन, मुंज़मिद – जमी हुई, ठहरी हुई








om arya said,
June 13, 2009 at 8:01 PM
इतनी सुन्दर रचना जिसमे सिर्फ भावनाये मानो गंगा सी पवित्र है ………..और शब्द बहे जा रहे हो.
दिनेशराय द्विवेदी said,
June 13, 2009 at 9:25 PM
बहुत मार्मिक कविता है,
शब्द इस तरह भी बोल सकते हैं।
Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar said,
June 13, 2009 at 11:06 PM
कविता पूरी तरह पढ़ भी नहीं पाया था कि एक सिहरन सी दौड़ गयी. लाजवाब !
nirmla said,
June 14, 2009 at 8:42 AM
शायद पहली बार आपके ब्लोग को देखा है कई रचनायें लगातार पढ गयी और पाया की इतनी बेह्तरीन रचनाओं से अब तक वंचित रही ये मेरा दुर्भाग्य था सुन्दर अद्भुत और सश्क्त रचनायें बधाई
Girijesh Rao said,
June 14, 2009 at 6:13 PM
“झडे़ हुए फूलों की महक से
मेरी जीभ बिंध गई”
“उसने मेरी सांसों की गर्मी को छुआ
और अपनी ठंडी हथेलियों से
मेरा चहरा थाम लिया”
“उसकी मुंज़मिद नज़रों से
बिजली कड़की ”
विरुद्धों का सामंजस्य कहूँ या प्रेम की उलटबासियाँ ?
ज़रूर बताइए।
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल said,
June 14, 2009 at 11:10 PM
बहुत खूब, अच्छे भाव
शशि said,
June 17, 2009 at 12:26 PM
‘मैंने उससे
एक बार फिर कहना चाहा
मुझे तुमसे कुछ कहना है
उसने आवाज़ की टूटन को भांप कर
मेरे कांपते लबों का बोसा लिया
और मेरे कान में फुसफुसाई
मैं जानती हूं मेरे सरताज़
उसकी मुंज़मिद नज़रों से
बिजली कड़की
और मैं जड़ हो गया
हमारे पास
यूं ही गुजार देने के लिए
अब और शामें नहीं बच रही थी’
अब और शामें नहीं बच रही थी इसका आशय यही है ना की शादी हो गयी
या कुछ ओर …………………………………….
अन्यथा न लेते हुए ……………………
शशि said,
June 17, 2009 at 12:27 PM
लाजबाब आप की ये कविता ओर आप ………………..
Shama said,
June 17, 2009 at 11:34 PM
Bohot bhavuk rachana..
http://kavitasbyshama.blogspot.com
http://aajtakyahantak-thelightbyalonelyspot.com
Baaqee links in blogspe mil jayenge…snehil nimantran hain…zaroor aayen aur hausla afzayee karen!
M Verma said,
June 20, 2009 at 4:32 AM
ek ek shabd bolte hue. bahut hee nazuk see shandar rachana.
nishant bisen said,
July 15, 2009 at 6:27 PM
ग़ज़ब… लाजवाब
http://aapaskibaat-nishant.blogspot.com/
anjali singh said,
August 6, 2009 at 5:54 PM
itane bakhubhi tarah se in pankatiyo ko piroya gaya hai mano dage me moti. wah inka kya kayana.