भूख एक बेबाक बयान है

भूख एक बेबाक बयान है
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

bhookh-bayaan

भूख के बारे में शब्दों की जुगाली
साफ़बयानी नहीं हो सकती
भूख पर नहीं लिखी जा सकती
कोई शिष्ट कविता

भूख जो कि कविता नहीं कर सकती
उल्टी पडी डेगचियों
या ठण्डे़ चूल्हों की राख में कहीं
पैदा होती है शायद
फिर खाली डिब्बों को टटोलती हुई
दबे पांव/ पेट में उतर जाती है

भूख के बारे में कुछ खा़स नहीं कहा जा सकता
वह न्यूयार्क की
गगनचुंबी ईमारतों से भी ऊंची हो सकती है
विश्व बैंक के कर्ज़दारों की
फहरिस्त से भी लंबी
और पीठ से चिपके पेट से भी
गहरी हो सकती है

वह अमरीकी बाज़ की मानिंद
निरंकुश और क्रूर भी हो सकती है
और सोमालिया की मानिंद
निरीह और बेबस भी

निश्चित ही
भूख के बारे में कुछ ठोस नहीं कहा जा सकता
पर यह आसानी से जाना जा सकता है
कि पेट की भूख
रोटी की महक से ज़ियादा विस्तार नहीं रखती
और यह भी कि
दुनिया का अस्सी फीसदी
फिर भी इससे बेज़ार है

भूख एक बेबाक बयान है
अंधेरे और गंदे हिस्सों की धंसी आंखों का
मानवाधिकारों का
दम भरने वालों के खिलाफ़

दुनिया के बीस फीसदी को
यह आतिशी बयान
कभी भी कटघरे में खड़ा कर सकता है

०००००
रवि कुमार

16 Comments

  1. manvinder said,

    May 7, 2009 at 11:17 AM

    भूख एक बेबाक बयान है
    अंधेरे और गंदे हिस्सों की धंसी आंखों का
    मानवाधिकारों का
    दम भरने वालों के खिलाफ़

    दुनिया के बीस फीसदी को
    यह आतिशी बयान
    कभी भी कटघरे में खड़ा कर सकता है

    bahut khoob

  2. May 7, 2009 at 11:41 AM

    मैं सम्मोहित हूँ इस कविता के प्रभाव से । सोच रहा हूँ, मैं भूख पर लिखी कविता की लिखन से सम्मोहित हो गया !
    आभार आपका ।

  3. May 7, 2009 at 11:43 AM

    भूख की त्रासदी, उस का उद्गम, उस के होने की वजह, उस के उन्मूलन के उपाय का संकेत। क्या कुछ नहीं है इस कविता में। यह कविता अनेक मोटे ग्रन्थों से भी अधिक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

  4. Anand said,

    May 7, 2009 at 12:41 PM

    ओह। बड़ा डरावना, नंगा दृश्‍य खींच दिया…

    - आनंद

  5. भगत said,

    May 7, 2009 at 3:41 PM

    वाह भाई क्या खूब लिखते हो वाकई आपने
    सच ही कहा है भूख भूख ही होती है जब वो अपनी सीमायें लांघती है तो

    “वह न्यूयार्क की
    गगनचुंबी ईमारतों से भी ऊंची हो सकती है
    विश्व बैंक के कर्ज़दारों की
    फहरिस्त से भी लंबी
    और पीठ से चिपके पेट से भी
    गहरी हो सकती है”
    वह अमरीकी बाज़ की मानिंद
    निरंकुश और क्रूर भी हो सकती है”
    और जब
    और सोमालिया की मानिंद
    निरीह और बेबस भी”

    आपको इस रचना के लिखने पर बधाई |

  6. vijay said,

    May 8, 2009 at 11:58 AM

    ab soch raha hu ki mai kavita kyon nahi likhta. prabhavshali abhivykti.

  7. Dr Anurag said,

    May 8, 2009 at 1:30 PM

    .भूख सिर्फ पेट में नहीं लगती….भूख अब अपनी शक्ल बदल रही है……सबकी भूख अलग अलग है……

    .भूख सिर्फ पेट में नहीं लगती….भूख अब अपनी शक्ल बदल रही है……सबकी भूख अलग अलग है……

    • ravikumarswarnkar said,

      May 9, 2009 at 11:59 AM

      पेट की भूख ही
      सबसे पहली और आखिरी भूख है

      बाकी सब शगल हैं,अघाए हुए पेटों का
      भरे पेट के भौभाते भजनों का

      जब पेट भरा हो
      और आगे भी भरते रहने की निश्चिंतता हो

      जब भूख शब्द के मायने भी
      हमारी ज़िंदगी में अहसास खोने लगते हैं

      तब ही ना हमें लगता है
      भूख अब अपनी शक्ल बदल रही है
      अपने अस्तित्व को
      कहीं और टटोल रही है…..
      ०००००

      आपका यही मतलब है, शायद

  8. Dr Anurag said,

    May 8, 2009 at 1:31 PM

    ..आपको पढना शायद कुछ रास्तो से गुजरने जैसा है…..
    .भूख सिर्फ पेट में नहीं लगती….भूख अब अपनी शक्ल बदल रही है……

  9. Ashish modi said,

    May 9, 2009 at 11:20 AM

    guru kya likha hai yaar padte waqt kuch drashy aakho k samne aa gaye
    निश्चित ही
    भूख के बारे में कुछ ठोस नहीं कहा जा सकता
    पर यह आसानी से जाना जा सकता है
    कि पेट की भूख
    रोटी की महक से ज़ियादा विस्तार नहीं रखती
    और यह भी कि
    दुनिया का अस्सी फीसदी
    फिर भी इससे बेज़ार है
    bahut hi sundar kavita

  10. Ashish modi said,

    May 9, 2009 at 11:28 AM

    bhai phir kuch likhne ko man kiya but samjh nahi aa raha kya likhu
    wo aaj kal realty shows mai bolte hai na speechless
    wahi alam hai

  11. Ashish modi said,

    May 9, 2009 at 11:30 AM

    ha ek baat jarur hai ye aap se sunna bhi chata hu, jab aap sunaoge or jayda prabhavshali hogi ye.

  12. Dr.Ramkumar Ramarya said,

    May 9, 2009 at 4:16 PM

    Priya Bhai ,
    Itni sashakta abhivyakti , itna sashakta chitrankan …shabdon ko nithalla kar dene wali pratibha…. aap keval prashansneey hi nahi anukarneey hain ..but this is true , no talent can be followed exactly. Immitation is just a satisfaction of doing something well. original is original…let’s not allow stops…
    Dr.Ramarya,

  13. shivkuamr said,

    May 10, 2009 at 3:58 PM

    दुनिया के बीस फीसदी को
    यह आतिशी बयान
    कभी भी कटघरे में खड़ा कर सकता है

    wakai main yah panktiya sochane ko vivash karati hai.

  14. shyam skha said,

    May 11, 2009 at 7:00 AM

    भूख वाकई भूख है और कुछ नहीं
    आदमी की भूख
    पेट की
    तन की
    मन की
    सुन्दर कविता पर बधाई

  15. shyam skha said,

    May 11, 2009 at 7:02 AM

    बेहतरीन अभिव्यक्ति


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