मैं जाग रहा होता हूँ रात रात

मैं जाग रहा होता हूँ रात रात

जबकि सभी लगे हैं
इमारतों की उधेड़बुन में
मैं एक बुत तराश रहा हूँ

जबकि कांटों की बाड़ का चलन
आम हो गया है
मैं महकते फूलों की
पौध तैयार कर रहा हूं

जबकि सभी चाहतें हैं
आसमानों को नापना
मैं गहराईयों को टटोल रहा होता हूं

यह अक्सर ही होता है
लोग समन्दर पी जाते हैं
मैं चुल्लू बनाए
झुका रह जाता हूं

या कि जब लोग सोए होते हैं
हसीन ख़्वाबों में खोए
मैं जाग रहा होता हूं रात रात
मैं कर रहा होता हूं कविता

-रवि कुमार

3 Comments

  1. pallav said,

    March 15, 2009 at 11:31 AM

    badhiya kavita,badhai.
    pallav

  2. sunil dandwate said,

    March 23, 2009 at 12:30 PM

    Mere bhai ye “Mai “chodkar “hum” per likhana shuru karo.Mai se ahankar pradarsit hota he,sab agar mai-mai karne lage to phir duniya kaise chalehi.Tum bi hum jaise hi ho bhai bus sirf fark itna he ki tumhe shabdo ko khubsurat tarike se pirona ata he.

    • ravikumarswarnkar said,

      March 29, 2009 at 10:33 PM

      हमें हम ही होना चाहिये……..
      परंतु बिना “मैं” की संपूर्ण यात्रा के, सही मायनों में “हम” तक पहुंचना संभव ही नहीं है….
      मैं यानि एक व्यक्ति, और हम यानि संपूर्ण समाज के आपसी द्वंद और अंतर्संबंधों को समझे बगैर हम अपनी भूमिकाओं का सही निर्धारण नहीं कर सकते…..


Post a Comment